Monday, 25 May 2020

भारतीय इतिहास के कुछ विषय : वर्ग 12 पाठ तीन – बन्धुत्व , जाति तथा वर्ग (भाग -4)

सामाजिक  असमानताएं :
वर्ण व्यवस्था :-
ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में चार वर्णों की उत्पति  विराट पुरूष के चार अंगों से मानी गयी है |
मनुस्मृति पुरूष सूक्त में कहा गया है -
       ब्राह्मणोस्य मुख मासीद बाहू राजन्य: कृत:
       उरूतदस्य यदवैश्य: पदथयां शूद्रोअजायातं  |
अर्थात विराट पुरूष (ईश्वर ) के मुख से ब्राह्मण , बाहु से क्षत्रिय , जंघा से वैश्य एवं  पैरों से  शूद्र  वर्ण की उत्पति हुई है |
महाभारत के शांतिपर्व के 188 वें अध्याय के 10 वें श्लोक में वनों की उत्पति ब्रह्मा से इस प्रकार बताई |
          ब्रह्मणां तू सीनो  क्षत्रियाणाम तू लोहित: |
          वैश्यानां पीत को वर्ण शूद्राणामसितास्तथा ||
अर्थात ब्रह्मा ने ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य एवं शुद्र  वर्ण की उत्पति की जिनके रंग क्रमश: श्वेत , लोहित , पीला एवं काला था |
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* पूर्व वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर निर्धारित थी | जो व्यक्ति जैसा कर्म करेगा उसका वर्ण वही होगा | अर्थात एक ब्राह्मण सैनिक का कार्य करता था  तो उसका वर्ण  क्षत्रिय  वर्ण में गिना जाता था | यदि एक शुद्र  वेदों का अध्ययन करता था और पूजा अनुष्ठान सम्पन्न कराता था तो उसे ब्राह्मण वर्ण की श्रेणी में गिना जाता |
*  परन्तु उत्तर वैदिक काल में यह व्यवस्था बदल गयी और वर्ण जन्म के आधार पर निर्धारित होने लगी |  इस धारणा को पुष्ट करने के लिए धर्म सूत्रों एवं धर्मशास्त्रों में एक आदर्श व्यवस्था का उल्लेख किया जिसमें स्वयं उन्हें पहला दर्जा प्राप्त है, एक दैवीय व्यवस्था है |
*  धर्मशास्त्रों  और  धर्मसूत्रों  में चार वर्गों के लिए आदर्श  "जीविका " से जुड़े  कई नियम बनाये |
1. ब्राह्मणों का कार्य  अध्ययन , वेदों की शिक्षा , यज्ञ सम्पन्न  करना और कराना , दान देना और लेना था |
2. क्षत्रियों का कार्य  युद्व करना , लोगों की सुरक्षा करना , न्याय करना , वेद पढ़ना , यज्ञ करना  और दान-दक्षिणा देना था |
3.  वैश्य का कार्य -  वैश्यों के लिए कृषि , गौ-पालन , व्यापार का कर्म अपेक्षित था |
4.  शूद्र का कार्य - शूद्रों के मात्र एक जीविका थी - तीनों - "उच्च " वर्णों की सेवा करना |

इन नियमों का पालन करवाने के लिए ब्राह्मणों ने दो-तीन नीतियाँ अपनाई |
1. वर्ण व्यवस्था की उत्पति एक दैवीय व्यवस्था है |
2. वे शासकों को यह उपदेश देते थे की वे इस व्यवस्था के नियमों  का अपने राज्यों में अनुसरण करे |
3. लोगों को यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न  किया की उनकी प्रतिष्ठा जन्म पर आधारित है |
                    किन्तु ऐसा करना आसान नही था | अत:  इन मानदंडों को बहुधा महाभारत जैसे अनेक ग्रन्थों में वर्णित कहानियों के द्वारा बल प्रदान किया  जाता था |
                  उदाहरण स्वरूप  एकलव्य ( जो एक आदिवासी भील जाति का था ) की कहानी | जिसमें द्रोणाचार्य  अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ तीरंदाज साबित करने के लिए एकलव्य से गुरु दक्षिणा में उसका दायाँ हाथ का  अंगूठा मांग लिया था |

राजा कौन ? 
*  शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही राजा हो सकते थे  | परन्तु इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण है जो यह प्रमाणित करता है की जो समर्थन और संसाधान जुटा सके वह राजनीतिक सत्ता का उपभोग कर सकता है |
* महाभारत में कर्ण सूत पुत्र होते हुए भी  दुर्योधन ने उसे " अंग" राज्य का राजा बनाया था |
* मौर्य वंश के शासक के क्षत्रिय होने पर  भी बहस होती रही है | बौद्व ग्रन्थों में इस वंश के शासकों को क्षत्रिय कहा गया है जबकि ब्राह्मण ग्रन्थ  उन्हें  " निम्न कुल " का मानते है |
*  नन्द वंश के शासक  " निम्न कुल " के होने पर भी  "मगध महाजनपद" पर शासन किया |
* शक  जो मध्य एशिया से भारत आए , ब्राह्मण मलेच्छ , बर्बर मानते थे |  परन्तु शक राजा रूद्रदामन  पश्चिमोतर भारत पर शासन किया साथ ही उसके परिवार के सदस्य के साथ  सातवाहन वंश के शासक ( जो स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और क्षत्रिय को दर्प करने वाला बताया )  वैवाहिक सम्बन्ध भी बनाए |


सवाल ?: 
1.  शास्त्र कहता है की  राजा सिर्फ  क्षत्रिय बन सकता है , ऐसे में शुंग वंश , कंव वंश , सातवाहन वंश  ( जो ब्राह्मण थे ) शासन किया  |
2.  सातवाहन शासकों ने  उन लोगों से वैवाहिक सम्बन्ध  स्थापित किये जो वर्ण व्यवस्था से ही बाहर थे |
3. सातवाहन शासकों ने अन्तर्विवाह पद्वति का पालन करते थे , जबकि ब्राह्मणीय ग्रन्थों में  बहिर्विवाह प्रणाली प्रस्तावित है |
भातीय इतिहास के कुछ विषय : बन्धुत्व , जाति और वर्ग 
भारतीय इतिहास के कुछ विषय : बंधुत्व,जाति और वर्ग 
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