Saturday, 28 March 2020

ताम्र पाषाण काल एवं संस्कृति

ताम्र पाषाण काल एवं संस्कृति

ताम्र पाषाण काल एवं संस्कृति

महत्वपूर्ण तथ्य----
*  सिंधु  घाटी की सभ्यता के अपकर्ष काल में भारत के कुछ भागो में तांबे के सीमित प्रयोग से कुछ कृषक बस्तियां विकसित हो रहे थी,  यद्यपि इन बस्तियों के लोगों के अधिकांश उपकरण प्रस्तर  के ही थे , इसलिए इन्हें  ताम्र पाषणिक बस्तियां कहा गया है ।
*  सर्वप्रथम ताँबा धातु का प्रयोग किया गया था । मनुष्य ने पत्थर एवं तांबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग किया गया इसलिए यह काल ताम्रपाषाणिक काल के नाम से जाना गया ।
*  भारत में ताम्र पाषाण काल के मुख्य क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी राजस्थान (अहार एवं गिलूंड) , पश्चिमी मध्यप्रदेश ( मालवा,कयथा एवं ऐरण ) था।
*  पश्चिमी महाराष्ट्र में अहमदनगर के जोर्वे, नेवासा, दैमाबाद , चन्दौली, सोनगांव , इनामगांव ये सभी स्थल जोर्वे  संस्कृति के है ।
*  नव्दाटोली में उत्खनन से अनाजों के साक्ष्य मिले  है ।
*  अहार से पत्थर निर्मित गृह के अवशेष प्राप्त हुए है ।
*  इनामगांव में कुम्भकार , धातुकार , हांथी दांत के शिल्पी , टेराकोटा (मिट्टी की मूर्ति) बनानेवाले कारीगरों के साक्ष्य मिलें है ।
*  इस काल के लोग मातु देवी की पूजा करते थे और वृषभ  धार्मिक महत्व का प्रतीक था ।
*  काले व लाल मृदभाण्डों का प्रयोग के साक्ष्य इस काल मे मिलते है ।
*  1200 ई0 पू0 के लगभग ताम्र-पाषनिक संस्कृति विलुप्त हो गई ।
* जोर्वे संस्कृति लगभग 500 ई0 पू0 तक अस्तित्व में थी ।

                     ताम्र-पाषाण कालीन स्थल

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