Wednesday, 10 February 2021

महायान सम्प्रदाय

  Mahayana school




 बौद्व धर्म की चतुर्थ तथा अन्तिम संगीति कुषाण शासक कनिष्क के राज्यकाल में काश्मीर के कुंडलवन  में हुई | इसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की तथा अश्वघोष इसके उपाध्यक्ष बने |  यहाँ बौद्व ग्रंथो के कठिन अंशों पर सम्यक विचार -विमर्श  किया गया तथा प्रत्येक पिटक पर भाष्य लिखे गए | कनिष्क ने इन्हें ताम्रपत्रों पर खुदवा कर एक स्तूप में रखवा दिया | त्रिपिटकों पर लिखे गए इन भाष्यों को ही "विभाषाशास्त्र" कहा जाता है | इसी समय बौद्व धर्म हीनयान तथा महायान नामक दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गए |

महायान सम्प्रदाय की लोकप्रियता के कारण :
 
       इस समय तक बौद्व मतानुयायियों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गयी थी | अनेक लोग इस धर्म में नवीन विचारों एवं भावनाओं के साथ प्रविष्ट हुए थे | अत: बौद्व धर्म के प्राचीन स्वरूप में समयानुसार परिवर्तन लाना जरुरी था | अत: इसमें सुधार की मांग होने लगी | इसके विपरीत कुछ रुढ़िवादी  लोग  बौद्व धर्म के प्राचीन आदर्शो को ज्यों-का-त्यों  बनाए रखना चाहते थे और वे उसके स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन अथवा सुधार नही लाना चाहते थे | ऐसे लोगों का सम्प्रदाय "हीनयान" कहा गया | यह मार्ग  सिर्फ भिक्षुओं के लिए ही सम्भव था |
            बौद्व धर्म का सुधारवादी सम्प्रदाय "महायान" कहा गया | महायान का अर्थ है - उत्कृष्ट मार्ग | इसमें परसेवा तथा परोपकार पर विशेष बल दिया गया | बुद्व की मूर्ती के रूप में पूजा होने लगी | यह मार्ग सर्वसाधारण के लिए सुलभ था | इसकी व्यापकता एवं उदारता को देखते हुए इसका "महायान " नाम सर्वथा उपयुक्त लगता है | इसके द्वारा अधिक लोग मोक्ष प्राप्त कर सकते थे |
            महायान में परसेवा तथा परोपकार पर बल दिया गया | उसका उद्वेश्य समस्त मानव जीवन जाति का कल्याण है | इसके विपरीत हीनयान व्यक्तिवादी धर्म है |
        महायान आत्मा एवं पुनर्जन्म में विश्वास करता है | महायान में मूर्तिपूजा का भी विधान है तथा मोक्ष के लिए बुद्व की कृपा आवश्यक मानी गयी है | परन्तु हीनयान मूर्ति-पूजा एवं भक्ति में विश्वास नही रखता | 
        महायान की साधन पद्वति सरल एवं सर्वसाधारण के लिए सुलभ है | यह मुख्यत: गृहस्थ धर्म है जिसमें भिक्षुओं के साथ-साथ सामान्य उपासकों को भी महत्व दिया गया हिया |
        महायान का आदर्श "बोधिसत्व" है | बोधिसत्व मोक्ष प्राप्ति के बाद भी दूसरे प्राणियों की मुक्ति का निरंतर प्रयास करते रहते है | महायान की महानता का रहस्य उसकी नि:स्वार्थ सेवा तथा सहिष्णुता है |
        आगे चलकर महायान सम्प्रदाय के दो सम्प्रदाय बन गए | महायान के सम्प्रदाय है - शून्यवाद (माध्यमिक ) तथा विज्ञानवाद (योगाचार ) 

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स्रोत :प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति 
के सी श्रीवास्तव 

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