Monday, 15 June 2020

इतिहास - विचारक ,विश्वास और इमारतें : वर्ग 12 पाठ-4 भाग-4

बुद्व और ज्ञान की खोज
        भारत का समाज  वैदिक धर्मावलम्बी वाला समाज रहा है | 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व वैदिक धर्म एक जटिल , कर्मकांड प्रधान तथा आडम्बर पूर्ण व्यवस्था के रूप में बन गया था | आम जनजीवन  यज्ञ एवं कर्मकांड की जटिलता से मुक्ति पाना चाहता था | ऐसे में महात्मा बुद्व का जन्म हुआ  जिन्होंने अपनी शिक्षाओं एवं सिद्वान्तों से कर्मकांड एवं कुप्रथाओं से जकड़ी  आम लोगों को एक सहज , सरल एवं बोधगम्य धर्म रूपी प्रकाश से प्रकाशित किया |
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बुद्व की सम्पूर्ण जीवनी भाग 1
बुद्व की सपूर्ण जीवनी भाग 2

*  बौद्व ग्रन्थों के अनुसार सिद्वार्थ  (बुद्व के बचपन का नाम ) शाक्य कबीले के सरदार के पुत्र थे | आरम्भिक जीवन महल के अन्दर सब सुखो के बीच बिता |
*  एक दिन रथकार के साथ शहर घुमने निकले | रास्ते में एक वृद्व व्यक्ति को , एक बीमार को , और एक लाश को देखकर उन्हें गहरा सदमा पहुँचा | उसी क्षण एक प्रसन्नचित सन्यासी को देखा |
* सिद्वार्थ ने निश्चय किया कि वे भी सन्यास का रास्ता अपनाएंगे तथा कुछ समय बाद सत्य की खोज में महल त्याग दिया |
*  वैशाख पूर्णिमा को पीपल वृक्ष के नीचे बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ और बुद्व कहलाये |
बुद्व की शिक्षाएं :
* बुद्व की शिक्षाएं सुत्त पिटक में लिखी गयी है |
* बुद्व की शिक्षाएं एवं उपदेश जनमानस की भाषा पाली भाषा में दी गयी जिसे आसानी से समझा सा सकता था |
* बौद्व दर्शन के अनुसार विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है , यह आत्माविहीन है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नही है | इस क्षण भंगुर दुनिया में दुःख मनुष्य के जीवन का अन्त्रन्हित तत्व है | घोर तपस्या और विषयासक्ति  के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुनिया के दुखों से मुक्ति पा सकता है | बौद्व धर्म के प्रारम्भिक परम्पराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था |
* बुद्व के अनुसार समाज का निर्माण इंसानों ने किया था न की भगवान ने |इसलिए राजाओं एवं गृह्पतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी |
*  बुद्व ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति , आत्म ज्ञान और निर्वाण के लिए व्यक्ति - केन्द्रित हस्तक्षेप और सम्यक कर्म की कल्पना की | निर्वाण का मतलब था अहं और इच्छा का खत्म हो जाना |
* बौद्व परम्परा के अनुसार अपने शिष्यों के लिए बुद्व का अंतिम निर्देश था , " तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनों क्योंकि तुम्हें खेद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूढना है "|
बुद्व के अनुयायी :
*    बुद्व के शिष्यों का दल तैयार होने पर संघ की स्थापना की | ये शिष्य भिक्षु कहलाये | वे शिष्य जो बुद्व के शिक्षाओं को मानते थे साथ ही अपने  ग्रहस्थ कार्यों का भी मूर्त रूप देते थे  उन्हें उपासक या उपासिका कहा  गया  |
* आरम्भ में सिर्फ पुरूष ही संघ में शामिल हो सकते थे | बाद में बुद्व शिष्य आनन्द  ने बुद्व को समझाकर महिलाओं के संघ में आने की अनुमति प्राप्त की |
*  बुद्व की उपमाता  महाप्रजापति गौतमी संघ में प्रवेश पाने वाली पहली भिक्खुनी थी | कई महिलाएं संघ में आई और बाद में थेरी बनी जिसका मतलब है ऐसी महिला जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो |
*  बुद्व के अनुयायी कई सामाजिक वर्गों से आए | इनमें राजा , धनवान , गृहपति  और सामान्य जन कर्मकार ,दास , शिल्पी  सभी शामिल थे |
*  संघ में आने वाले सभी व्यक्तियों को बराबर माना जाता था | संघ की संचालन पद्वति गणों और संघों के परम्परा पर आधारित थी | एकमत नही होने पर मदान द्वारा निर्णय लिया जाता था |
बौद्व धर्म का प्रसार :
* बुद्व के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद भी बौद्व धर्म तेजी से फैला | भारत के साथ -साथ श्रीलंका , म्यांमार, थाईलैंड , चीन आदि देशों में प्रसार हुआ |

बुद्व की सम्पूर्ण जीवनी भाग 1
बुद्व की सपूर्ण जीवनी भाग 2

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