Friday, 3 April 2020

गौतम बुद्व : बौद्ध धर्म एवं दर्शन (भाग -1)

जीवनी: गौतम बुद्व ( भाग -1)


* बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्म नेपाल के तराई में स्थित कपिलवस्तु के लुंबिनी ग्राम में शाक्य क्षत्रिय कुल में 563 ई0 पू0 में हुआ था ।

* इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था । इनकी माता का नाम महामाया देवी था, पिता - शुधोधन शाक्य गण के प्रमुख थे , पालन पोषण उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया था ।

* सिद्वार्थ का विवाह 16 वर्ष की आयु में "यशोधरा" नामक कन्या से हुआ ,जिनका बुद्व ग्रन्थो में "बिम्बा," "गोपा", " भदकच्छना" नाम मिलता है ।

* इनके पुत्र का नाम " राहुल " था ।

* सिद्वार्थ जब कपिलवस्तु की सैर पर निकले तो उन्होंने चार दृश्यों को क्रमशः देखा - बूढ़ा व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति, शव और एक सन्यासी।

* सांसारिक समस्याओं से व्यथित होकर सिद्वार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग किया , इस घटना को बुद्व धर्म में " महाभिनिष्क्रमण" की संज्ञा दी जाती है ।

* गृहत्याग के उपरांत सिद्वार्थ वैशाली के " अलार कलाम " से सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की , जो सिद्वार्थ के प्रथम गुरु माने जाते है ।

* उसके बाद राजगीर में " रुद्रकरामपुत" से शिक्षा ग्रहण की, जो सिद्वार्थ के दूसरे गुरु हुए ।
 
* तदुपरांत सिद्वार्थ उरुवेला ( बोधगया) वन की ओर प्रस्थान किए जहां कौण्डिय, बप्पा, भादिया, महानामा , एवं अस्सागी नामक पांच साधक मिले ।

* बोधगया के उरुवेला वन में निरंजना नदी के किनारे 6 वर्षों के कठिन तपस्या के बाद 35 वर्ष की अवस्था में वैशाख पूर्णिमा की रात , पीपल वृक्ष के नीचे , सिद्वार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ और सिद्वार्थ" बुद्व " कहलाये ।इस घटना को " सम्बोधि" कहते है ।

* कहा जाता है कि उरुवेला की नर्तकियों के ये शब्द उनके कानों में सुनाई दिए" अपनी वीणा के तारों को इतना ढीला न करो कि उनमें संगीत न निकले और इतना न कसो की वे टूट जाए ।" इससे सिद्वार्थ को " मध्यम मार्ग " अपनाने की प्रेरणा मिली । बौद्ध धर्म में इसे " मध्यम प्रतिपदा " कहा जाता है ।

* जिस वॄक्ष के नीचे सिद्वार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ उसे " बोधिवृक्ष" कहा गया ।

* जिस स्थान पर सिद्वार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ उसे बोधगया कहा जाता है ।

* गौतम बुद्व ने अपना पहला उपदेश सारनाथ (ऋशिपत्तनम) में दिया, जिसे बुद्व ग्रन्थों में " धर्मचक्रप्रवर्तन" कहा गया है ।

* बुद्व ने अपने सर्वाधिक उपदेश कौशल देश की राजधानी" श्रावस्ती" में दिए ।

* प्रमुख अनुयायी - बिंबिसार, अजातशत्रु, मुंड, प्रसेनजीत, उदयन , बिंदुसार , अशोक , आदि

* बुद्व ने अपना उपदेश " पाली भाषा " मे दिया ।

* बुद्व के प्रधान शिष्य "उपाली "और "आनन्द "थे ।

* महात्मा बुद्व ने अपना अंतिम उपदेश कुशीनारा के परिव्राजक "सुभच्छ" को दिया ।

* महात्मा बुद्व की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 483 ई0 पू0 कुशीनारा ( देवरिया, उत्तरप्रदेश) में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन ग्रहण करने के उपरांत हो गई , इसे बौद्ध धर्म में " महापरिनिर्वाण" कहा जाता है ।

* मल्लों ने अत्यंत सम्मानपूर्वक बुद्व का अंत्येष्टि संस्कार किया ।
 
* एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्व के शरीर के अवशेषों को आठ भागों में बांटकर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया ।

* बुद्व का जन्म एवं मृत्यु की तिथि को चीनी परम्परा के कैंटीन अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है ।

* महात्मा बुद्व को " एशिया का प्रकाश पुंज"(Light of Asia) कहा जाता है ।


गौतम बुद्व : बौद्ध धर्म  एवं दर्शन (भाग -1)

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