Tuesday, 5 May 2020

-12 ,पाठ -2 , राजा , किसान और नगर ( भाग -6)

बदलता हुआ देहात :
जनता में राजा की छवि
* इतिहासकारों ने विभिन्न अभिलेखों के अध्ययन के आधार पर  यह मालुम करने का प्रयास किया की राजाओं के बारे में प्रजा क्या सोचती है , परन्तु अभिलेखों से जबाब नही मिलते है |
* परन्तु जातक ( पहली सहस्राब्दी ई० के मध्य में पाली भाषा में लिखित ) और पंचतंत्र कथाओं के माध्यम से पता लगाया |

* इन कथाओं से यह पता चलता है की राजा और प्रजा के सम्बन्ध तनावपूर्ण थे | क्योंकि राजा अपने राजकोष भरने के लिए बड़े -बड़े कर लगाते जिससे किसान त्रस्त थे |

उपज बढाने के तरीके :
* 6ठीशताब्दी ई० पू० लोहे का फाल का प्रयोग होने से गंगा और कावेरी घाटियों में उर्वर भूमि पर खेती का विस्तार होने लगा |
* उपज बढाने के लिए उपाय 
-  भारी वर्षा ,
-  उर्वर भूमि ,
-   लोहे के फाल का प्रयोग 
-  सिचाईं  के लिए कुओं , तालाबों , नहरों का प्रयोग 
-   कठिन मेहनत से फसलों की पैदावार बढाने में मदद मिली |
* सिचाईं के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा निर्मित सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था | जूनागढ अभिलेख से पता चलता है |
* पंजाब और राजस्थान जैसे अर्धशुष्क  जमीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग 20वीं सदी से शुरू हुआ |
*उपमहाद्वीप और पर्वतीय और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में खेती के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे |

ग्रामीण समाज में विभिन्नताएं:
* समाज में खेती से जुड़े लोगों में उत्तरोतर भेद बढ़ रहा था |
* बौद्व कथाओं से यह जानकारी मिलती है की भूमिहीन , खेतिहर श्रमिकों , छोटे किसानों और बड़े-बड़े जमींदारों का वर्ग बन चूका था |
* पाली भाषा में गह्पति का प्रयोग छोटे किसानों  और जमींदारों के लिए किया जाता था |
* गह्पति : गहपति  घर का मुखिया होता था और घर में रहने वाली महिलाओं , बच्चों, नौकरों और दासों पर नियन्त्रण करता था | घर से जुड़े भूमि , जानवर या अन्य सभी वस्तुओं का वह मालिक होता था | कभी -कभी इस शब्द का प्रयोग नगरों में रहने वाले सम्भ्रान्त व्यक्तियों और व्यापारियों के लिए भी होता था |
* बड़े जमींदार और ग्राम प्रधान किसानो पर नियन्त्रण रखते थे |
* ग्राम प्रधान का पद प्राय: वंशानुगत होता था |
* तमिल संगम साहित्य में भी ग्रामीण समाज के विभिन्न वर्गों का उल्लेख मिलाता है |
* बड़े जमींदार - वेल्लालर  , हलवाहा - उल्वर , दास - अनिमई 

भूमिदान और नए संभ्रात  ग्रामीण :
* भूमिदान की नई प्रथा का पहला साक्ष्य  सातवाहन शासन काल में मिलता है | शासकों ने इन भूमिदान का उल्लेख अपने अभिलेख और ताम्र पत्रों में किये है | अधिकाँश अभिलेख संस्कृत और कुछ तमिल और तेलुगु में है |
* भूमिदान के जो प्रमाण मिले है वे साधारण तौर पर धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों को दिए गए है |
* ऐसा ही एक दान का उल्लेख    चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य    ( लगभग 375-415 ई० ) की पुत्री प्रभावती गुप्त ( उसका विवाह दक्कन पठार वाकाटक परिवार में हुआ था ) का मिलता है |
* अभिलेख से ग्रामीण प्रजा का भी पता चलता है | इनमें ब्राह्मण , किसान एवं अन्य जो शासकों या उनके प्रतिनिधियों को भेंट / उपहार प्रदान करते थे | 
* अभिलेख में यह भी ज्ञात होता है की ग्रामीण प्रधान के आदेश का पालन करना पड़ता था और कर भी देना  होता था |
भूमिदान का प्रभाव :इतिहासकारों में विवाद का विषय 
1. भूमिदान शासक वंश द्वारा कृषि को नए क्षेत्रों में प्रोत्साहित करने की एक  रणनीति थी |
2. भूमिदान से दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व को अपने समर्थक जुटाने का प्रयास था |
3. राजा स्वयं को उत्कृष्ट स्तर के मानव के रूप में प्रदर्शित करना चाहता था | 
* अग्रहार : अग्रहार उस भूमि को कहते थे जो ब्राह्मणों को दान किया जाता था | ब्राह्मणों  से भूमिकर या अन्य प्रकार के कर नही वसूले जाते थे |  ब्राह्मणों को स्वयं स्थानीय लोगों से कर वसूलने का अधिकार था |
* पशुपालक , संग्राहक , शिकारी , मछुआरे , शिल्पकार (घुमक्कड़  तथा एक हे स्थान पर रहने वाले ) और झूम की खेती करने वाले लोगों पर अधिकारियों या सामंतों का नियन्त्रण नही था |


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