Saturday, 2 May 2020

-12 ,पाठ -2 , राजा , किसान और नगर ( भाग -5)

राजधर्म के नवीन सिद्वांत :
दक्षिण के राजा और सरदार :
सरदार और सरदारी : सरदार एक शक्तिशाली व्यक्ति होता है जिसका पद वंशानुगत भी हो सकता है और नहीं भी | उसके समर्थक उसके खानदान के लोग होते है | 
सरदार के कार्य : 
1. विशेष अनुष्ठान का संचालन 
2. युद्व के समय नेतृत्व करना 
3. विवादों को सुलझाने में  मध्यस्थता की भूमिका निभाना 
4. वह अपने अधीन लोगों से भेंट लेता है और अपने समर्थकों में उस भेंट का वितरण करता है |
        सरदारी में सामान्यतया कोई स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते है |
सरदार और सरदारियों का उदय भारतीय उपमहाद्वीप के दक्कन और उससे दक्षिण के क्षेत्र में स्थित तमिलकम  ( तमिलनाडू  , आंध्रप्रदेश और केरल के कुछ हिस्से ) में हुआ   जहां  चोल , चेर और पांड्य का शासन  शामिल था |

दक्षिण के सरदार और सरदारियों के जानकारी स्रोत :
* तमिल संगम ग्रन्थ, सिल्प्पादिकारम ( महाकाव्य) 

दैविक राजा :
* पहली सदी ईसा पू0  राजाओं के लिए उच्च स्थिति प्राप्त करने के लिए अपने आपको देवी-देवताओं के साथ  जुड़ना आरम्भ किया जिसका प्रमुख उदहारण कुषाण वंश के शासकों का था |
* कुषाण शासको ने अपने अभिलेखों और सिक्कों तथा मूर्तियों के माध्यम
 से इसे जोड़ने का  प्रयास किया  था |
* कुषाण शासको के विशालकाय मूर्ती मथुरा के माट नामक देवस्थान से   तथा अफगानिस्तान के एक देवस्थान से   मिला है जिसमें अपने नाम के आगे " देवपुत्र " की उपाधि लगाईं थी | 
 * चौथी शताब्दी ई० में गुप्त साम्राज्य के साक्ष्य इतिहास , सिक्कों, और अभिलेखों से मिलती है |
* इस वंश के प्रतापी सम्राटों में चन्द्रगुप्त प्रथम , समुद्रगुप्त , चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य  , कुमारगुप्त और स्कंदगुप्त था |


* गुप्त वंश की प्रमुख जानकारी  हरिषेण द्वारा संस्कृत में लिखित प्रयाग प्रशस्ति  है |

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