Thursday, 28 May 2020

इतिहास - विचारक ,विश्वास और इमारतें : वर्ग 12 पाठ-4 भाग-8

पौराणिक हिन्दू धर्म का उदय 
इस नई परंपराओं में वैष्णव मत और शैव मत के बारे में अध्ययन करेंगे |
वैष्णव मत :
                वैष्णव मत का विकास भागवत धर्म से हुआ है | भागवत धर्म के प्रवर्तक  श्री कृष्ण को माना है | वैष्णव धर्म के अधिष्ठाता देवता विष्णु है |
                पाणिनी रचित "  अष्टाध्यायी " ग्रन्थ में भागवत धर्म का उल्लेख मिलता है |
                छन्दोग्य उपनिषद में भी  श्रीकृष्ण को देवकी पुत्र और अंगीरस का शिष्य बताया गया है |
                भागवत धर्म का प्रमुख केंद्र मथुरा था जहां से देश के अन्य भागों में फैला |
वैष्णव धर्म का चरमोत्कर्ष गुप्त कल ( 319-550 ई. ) में हुआ | विष्णु का वाहन " गरुड़ " गुप्त राजाओं का  राजचिंह था  और वैष्णव धर्म राजधर्म |
गुप्त काल में बने प्रमुख विष्णु मन्दिर 
1. तिगवा विष्णु मंदिर ( जबलपुर , मध्यप्रदेश )
2. देवगढ़ का दशावतार मंदिर ( झांसी , मध्य प्रदेश )
3. ऐरण का विष्णु मन्दिर  ( महाराष्ट्र )

                            राजपुत काल के दौरान वैष्णव मत का विकास हुआ  | उस काल के विभिन्न लेखों  " ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: " कहकर भगवान श्री विष्णु के प्रति श्रद्वा प्रकट की गयी | 
                             गुप्त काल में लिखे गए  पुराणों में श्री विष्णु के दस अवतारों का वर्णन मिलता है | कालांतर में इनकी मूर्तियाँ निर्मित की गयी |
दस अवतार : 
1. मत्स्य अवतार: महा जलप्रलय के समय  भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण कर पृथ्वी की वेदों एवं मनु की रक्षा की |

2. कच्छप अवतार : महा जलप्रलय के समय अमृत और बहुमूल्य रत्न समुद्र में विलीन हो गए | ऐसे में श्री विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल पर्वत रखकर नाग को डोरी बनाकर देवताओं ने समुद्र मंथन किया | इस मंथन से अमृत , लक्ष्मी एवं 14 अन्य रत्नों की प्राप्ति हुई |

3. वराह अवतार : जब पृथ्वी पर राक्षस राज हिरण्याक्ष  का जुल्म बाद गया तो श्री विष्णु ने वराह अवतार के रूप में जन्म लेकर उससे पृथ्वी की रक्षा की |

4.  नृसिंह अवतार :  भक्त पहलाद को उसके ही पिता राक्षस हिरन्यकश्यप  से बचाने के लिए नरसिंह का अवतार लिया |

5. वामन अवतार : ऐसा कहा जाता है की बलि नामक राक्षस ने समस्त ब्राह्मांड पर अधिकार कर लिया था परन्तु वह एक महादानी भी था | देवताओं के अनुनय-विनय पर श्री विष्णु ने बौने का अवतार लिया और  बलि के समक्ष तीन पग भूमि माँगी | बलि  तैयार हो गया | फिर श्री विष्णु ने अपना विशाल आकार धारण किया और दो पग में पृथ्वी , आकाश को नाप दिया | तीसरा पग बलि के सिरपर रखा जिससे बलि पाताल लोक चला गया |

6.  परशुराम अवतार : इन्होने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर दिया था |

7.  राम अवतार : भगवान श्रीविष्णु  ने   रावण को वध करने के लिए  श्री राम के रूप में अवतार लिए |

8.  कृष्ण अवतार : राक्षस कंस को मारने के लिए श्री विष्णु ने श्री कृष्ण का अवतार लिया |

9.  बुद्व अवतार : पशु बलि रोकने, लोगों को धर्म का , दया का,सत्य का , अहिंसा का उपदेश देने के लिए श्री विष्णु का बुद्व के रूप में अवतार हुआ |

10. कल्कि अवतार :  ऐसा माना जाता है की कल्कि अवतार  भविष्य में लिया जाने वाला अवतार है|
कलयुग में अपराध , अधर्म से पृथ्वी को मुक्त करने के लिए श्री विष्णु श्वेत अश्व पर सवार होकर अवतार लेंगे |

दक्षिण भारत में वैष्णव मत :
 बौद्व धर्म एवं जैन धर्म के बढ़ाते प्रभाव को रोकने के लिए वैष्णव मत का प्रचार -प्रसार किया गया |
दक्षिण भारत में वैष्णव अनुयायियों को आलवार संत कहा गया | आलवार का अर्थ होता है ज्ञानी व्यक्ति | आलवार संतों की संख्या 12 बताई गयी है |
वैष्णव मत के प्रमुख संत :
नाथमुनी, यमुनाचार्य, रामानुजाचार्य , आदि 
वैष्णव मत के सिद्वांत :
1. विष्णु भक्ति द्वारा मोक्ष प्राप्ति पर बल 
2. ज्ञान , कर्म एवं भक्ति द्वारा मोक्ष पर बल 
3. अवतारवाद पर विश्वास 

अवतारवाद की पुष्टि भागवत गीता और रामचरितमानस में भी मिलता है |
गोस्वामी तुलसी दास लिखते है :
 

                                "  जब जब होहिं धरम के हानि |
                                      बढ़हिं असुर महाभिमानी ||
                                     तब तब प्रभु धर विविध शरीरा |
                                     हरिहं कृपा निधि सज्जन  पीढ़ा ||"
भागवत गीता में कहा गया है -
                            " यदा  यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवती भारत |
                             अभ्युथानम धर्मस्य  तदात्मानं  सृजाम्यह्न्म ||
                             परित्राणाय साधुनां विनाशाय च  दुष्कृताम |
                             धर्म संस्थापनाथार्य सम्भवामि युगे युगे ||"
                        अर्थात  हे भारत | जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्वी होती है तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ |  साधू-संतों के उद्वार व दुष्टों के विनाश के लिए , धर्म की स्थापना करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ  |






 

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